फ़िल्मी गानों को अच्छी निगाह से देखना शुरू किया जब लताजी गायन क्षेत्र में आईं

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आज सुर साम्राज्ञी, भारत रत्न लता मंगेशकर का जन्मदिन है। वे आज 90वें वर्ष में प्रवेश कर रहीं हैं

एक बार यूरोप के टूर से वापस आने पर अमिताभ बच्चन ने कहा था, “बहुत से विदेशी जब हमसे मिलते हैं तो कहते हैं हमारे पास वो सब कुछ है जो आपके पास है इंडिया में, नहीं है तो बस दो चीजें: ताज़महल और लता मंगेशकर।”

प्रियंका राय/पटना
जब से लताजी गायन के क्षेत्र में आई तब से लोगों ने फ़िल्मी गानों को इज़्ज़त भरी निगाह से देखना शुरू किया और फ़िल्मी गाने हवेलियों, नाचघरों और कोठों की ही जागीर न बन भारतीय मध्यमवर्गीय रसोइयों तक पहुंच गए। गानों की शोहरत बढ़ी तो रिकॉर्ड कम्पनियों ने रिकार्ड्स पर पहली बार पार्श्वगायक व गायिकाओं के नाम प्रकाशित करने शुरू किए। इसमें लता जी के प्रति लोगों के प्यार की बहुत बड़ी भूमिका थी।
 
लताजी ने गायन के क्षेत्र को ठीक उतने ही साल दिए हैं जितना कि भारत की आज़ादी को हुए हैं जी हां,पूरे 75 साल। हम आप जब चलाऊ फ़िल्म संगीत सुनते हैं तो गायिकी की उन बारीकियों को नही पा सकते जो हम लता जी की गायिकी का कोई फिल्मी गीत सुनते वक़्त पाते हैं क्योंकि, लता जी की एक छोटी हरकत भी जैसे कोई मींड़, तान या अ‍लाप उस गाने को एक नया स्तर प्रदान कर देती है।
 
हिंदी फ़िल्म संगीत की जब भी बात होगी तो लता जी को नौशाद के साथ विशुद्ध शास्त्रीय संगीत से सजे गानों, मदन मोहन के साथ बेहतरीन ग़ज़लों, एस. डी. बर्मन के साथ राग आश्रित गीतों, आर.डी.बर्मन के साथ मॉडर्न विदेशी सिम्फनीज़ के गीतों, सलिल चौधरी के साथ बांग्ला व असमिया राग आश्रित गीतों, रोशन के साथ शास्त्रीय व रागदारी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ सदाबहार एकल लोकप्रिय गीतों के लिए असाधारण ढंग से याद करेंगे।
 
एक बार यूरोप के टूर से वापस आने पर अमिताभ बच्चन ने कहा था, “बहुत से विदेशी जब हमसे मिलते हैं तो कहते हैं हमारे पास वो सब कुछ है जो आपके पास है इंडिया में, नहीं है तो बस दो चीजें: ताज़महल और लता मंगेशकर।”
भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में लता जी अपनी आवाज़ के चलते एक मानक बन चुकी हैं।
 
एक बार की बात है, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान जो लता जी से काफी सीनियर थे, नौशाद साब के साथ बैठे हुए थे और चाय पी रहे थे नौशाद साब की बाल्कनी में और अंदर रेडियो पर लता जी का कोई राग आश्रित गाना बज रहा था।
नौशाद साब ने उनसे कुछ बोलना चाहा तभी उस्ताद जी ने एक हाथ से चुप रहने का इशारा किया। उस्ताद जी ने आंखें बंद की और लता जी का वो पूरा गाना सुना। जब गाना खत्म हुआ तो आँखों को खोला और हल्का मुस्कुरा कर बोले, “कम्बख़्त, कभी बेसुरी नहीं होती।”
 
लता मंगेशकर संगीत की सच्ची साधिका रही हैं। 70 साल का उनका रियाज़ है। बकौल लता मंगेशकर, “मैंने गायिकी की तरफ बस उस दृष्टि से देखा है जैसे ईश्वर को पूजा की निगाह से देखते हैं। मैं संगीत की सेवा से ही अपने जीवन को आगे ले जा सकती थी, जो मैंने करने का प्रयास किया।
 
आवाज़ की सत्ता का गौरव बखान जिसमें सच्चे सुरों के साथ कोई जीवंत उपस्थिति है तो बस लताजी ही हैं। वे शतायु हों और संगीत के सौ बरस की जय-यात्रा की साक्षी बनें, यही शुभकामना है।

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